महापुरुष इस आत्मा को बहुत आश्चर्य से देखता है
महापुरुष इस आत्मा को बहुत आश्चर्य से देखता है
सीताराम राधे कृष्ण सारे श्रोता गणों तो आप कृपया थोड़ा ध्यान से सुने कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इस व्यक्ति भाति सुनता है और कोई कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता |श्री कृष्ण जी बोल रहे हैं कि कोई एक महापुरुष इस आत्मा को बहुत आश्चर्य से देखता है अचंभित तरीके से बिल्कुल जैसे मतलब कि कुछ देख लिया हो बहुत ज्यादा और कोई कोई महापुरुष ऐसा होता है जो आश्चर्य की तरह से बिल्कुल देखता ही नहीं है भाती मतलब वह वर्णन करता है जैसे कि मैं बता रहा हूं आपको जीवन चक्र के बारे में कि यह जीवात्मा है कोई ऐसे डर जाता है जैसे भूत प्रेत की तरह से डर जाता है पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाति सुनता है और कोई कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता है यह बात सही है हमारे यहां पर नहीं बोलते कि आज वो उसने आत्मा देखी है आज उसने उसको चलते हुए देखा है किसी को आवाजें आती है तो उसको सुनाई देता है
हे अर्जुन तुम अपने जो प्रिय जनों के लिए शोक कर रहे हो
तो ये यह श्रीकृष्ण जी बोल रहे हैं उन्होंने सही वर्णन किया है हे अर्जुन यह आत्मा सबके शरीरों में सदा ही अवध है इस कारण संपूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने के योग्य नहीं है श्री कृष्ण जी बोलते हैं बहुत अच्छी बात बोलते हैं कि हे अर्जुन तुम अपने जो प्रिय जनों के लिए शोक कर रहे हो यह जीवात्मा तो इस संसार के हर प्राणी में है जितने भी जीव है जलचर हो कोई वायु वाले हो मतलब जो भी है सबके अंदर यह आत्मा है और एक उदाहरण दिया था आपको कि ये किराए का मकान है एक मिनट का भरोसा नहीं है कि किराएदार हमको कब बुला ले. यह एक जीवन चक्र है मतलब कैसे आप मोक्ष पा सकते हैं यह श्री कृष्ण जी पूरा बता रहे हैं कि उसके लिए भी शोक मत करो अगर शोक करना ही है तो या तो सभी के लिए शोक करो सिर्फ अपने प्रियजन के लिए क्यों शोक कर रहे हो जो शत्रु भी है तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है तो कृष्ण जी बोलते हैं हे अर्जुन तू अपने धर्म को देखकर भी तू भय तू अपने धर्म के सामने डरना नहीं. डर भी नहीं सकता है धर्म तो धर्म है जो धर्म है वह धर्म के हिसाब से ही तो आपको लड़ना है अब धर्म के लिए ही वह युद्ध हो रहा है इस कारण संपूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने के योग्य नहीं है उन्होंने यह बोला है इसीलिए तू संपूर्ण प्राणी उनके शोक करने के योग्य भी नहीं है यह एक जीवात्मा है यह ऐसे चलती रहेगी जब तक आपके कर्मों का हिसाब किताब लेखा जोखा चलेगा और जब तकआप परमात्मा में लीन नहीं होते हो यह जीवात्मा ना काटी जा सकती है ना मारी जा सकती है इस शरीर को ही कष्ट हो सकता है यह कमरा जो है कमरा खाली कर सकते हैं हम किराएदार तो फिर दूसरे कमरे में चले जाएंगे जाते हैं तो उस अच्छे कमरे को देखने के लिए अच्छा कमाना पड़ता है
भगवान का अर्थ क्या होता है
तो कमाने की जगह पर मेरा यह तात्पर्य है कि अगर कमाने की जगह पर आपको और अच्छा मन से ध्यान से सनातन धर्म और गीता और भगवान पर भरोसा करना पड़ेगा अपने आप को समझना पड़ेगा अंदर से अपनी सद्बुद्धि को सही करना पड़ेगा तो मेरा कमाने का मतलब यह है कि वह धन कमाता है अच्छा मकान पाने के लिए हम अच्छा योनि में तो हम नहीं जाना चाहेंगे हम तो भगवान में ही विलीन होना चाहेंगे मोक्ष भव सागर के पार जाना चाहेंगे वैकुंठ लोक में तो हमको भी उसके लिए कमाना पड़ेगा . क्या कमाना पड़ेगा भगवान को कमाना पड़ेगा . हमको भगवान को याद करना . अभी भगवान का अर्थ क्या होता है भगवान तो हम बोलते हैं भगवान का अर्थ क्या होता है भगवान का अर्थ है भ स भूमि,, ग श गगन, व ष वायु, अ ष अग्नि और न श नीर, ये पंच तत्व है इन पंच तत्व से यह हमारा कमरा बना हुआ है अर्थात तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्म युक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है श्री जी कहते हैं अर्जुन जी से कि हे अर्जुन तुझे डरना नहीं चाहिए |क्षत्रिय के लिए युद्ध से बढ़कर कुछ भी कल्याणकारी नहीं है
श्री कृष्ण जी कहते हैं हे पार्थ
क्योंकि धर्म के लिए तुम युद्ध कर रहे हो धर्म की स्थापना कर रहे हो सनातन धर्म की स्थापना कर रहे अच्छा हा एक चीज और बता रहा हूं मैं सनातन धर्म की स्थापना हम कर रहे हैं धर्म सिर्फ एक ही है सनातन बाकी क्या है कुछ पता नहीं हमें ज्ञान भी नहीं है जिसका आदि ना अंत अनादि है किसी ने नहीं देखा सबको यही पता है सबसे पुराना धर्म हिंदू धर्म है हिंदू नहीं हिंदू यह एक अंग्रेजों ने सिंधु घाटी के नदी प उनसे सिंधू नहीं बोला आपको धर्म सिर्फ सनातन ही है और कोई नहीं है तो श्री कृष्ण जी कहते हैं हे पार्थ अपने आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं तब उन्होंने बोला कि तुम श्री कृष्ण जी बोलते हैं अर्जुन जी से कि हे पार्थ तुम धर्म के लिए लड़ रहे हो धर्म के लिए लड़ने वाला पुरुष जो स्वर्ग का द्वार है वह स्वर्ग का द्वार खुला हुआ होता है तो तुम स्वर्ग के द्वार को पाने के लिए ही युद्ध कर रहे हो उन्होंने बोला हे पार्थ अपने अपने अपने आप प्राप्त हुए कि आपको स्वर्ग जाने के लिए एक क्षत्रिय की भाति युद्ध करना पड़ रहा है फिर भी अभी इसके बाद मैं भगवत गीता के बाद में मैं मेरे पास वेद है मैं वेद भी पढ़ना चाहूंगा तो वह मैं आपको भी सुनाना चाहूंगा उसके बारे में उसका हिंदी का वर्णन भी है तो हिंदी में सुनाना चाहूंगा हमारे वेदों में क्या-क्या लिखा हुआ है इस वेद में थोड़ा समय तो लगेगा ही किंतु यदि तू इस धर्म युक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्व धर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा
माननीय पुरुष के लिए आप कर्ति जो माननीय खुद में एक पुरुष है
श्री कृष्ण जी कहते हैं अर्जुन तू धर्म युक्त यह धर्म वाला युद्ध अगर नहीं करता है तो स्व धर्म अपना धर्म और कीर्ति को खो देगा बिल्कुल कि अपनी पहचान सब कुछ खो देगा और पाप को प्राप्त हो जाओगे श्री कृष्ण जी कि तू अपने स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा तो पाप वही है दुनिया फिर भगोड़ा बोलती है डरपोक बोलती है तो अर्जुन जी भी अपने परिवार और अपने धर्म के लिए ही लड़ रहे थे जो ये युद्ध हुआ था तो धर्म के ही लिए युद्ध हुआ था धर्म और अधर्म के बीच में हुआ था ये आप भी जानते हैं दुर्योधन अधर्म में तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली आपकी ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए आपकी ति मरण से भी बढ़कर है तो श्री कृष्ण जी कहते हैं तथा कितने समय तक तुम्हारी बुराई होगी यह पता नहीं कि वो डरपोक था आप कीर्ति मतलब उन्होंने यह बोला है कि आप कर्ति का कथन करेंगे ये पूरा पूरा गुणगान गाता गाते बताते रहेंगे एक दूसरे से एक दूसरे को बताते रहेंगे और माननीय पुरुष के लिए आप कर्ति जो माननीय मतलब खुद में एक पुरुष है ना आप कृति मतलब के यह डरपोक पना और भी भाग जाना यह एक मरने के बेहतर है जो एक सम्मानित पुरुष है जो खुद में खुद एक सम्मान रखता है अगर वह किसी चीज से देख के डर के भाग जाता है तो उससे मर मृति घोषित हो जाना चाहिए श्री कृष्ण जी का तात्पर्य यह है कि आने वाले समय में अगर तुम यह धर्म युक्त युद्ध छोड़कर नहीं युद्ध करते हो तो तुम्हारी लोग सदियों सदियों तक बुराई .
रामायण काल का एक उदाहरण
एक उदाहरण मैं आपको देता हूं रामायण काल का एक उदाहरण है युग का एक मंथरा थी और एक केकई थी आपने सुना होगा केकई को राम जी से भगवान विष्णु से यही वरदान मिला था ठीक है वरदान पहले ही मिला था जब पैदा होने से पहले मतलब य बहुत यह गाथा में बाद में बताऊंगा के कै से जब केकई ने विष्णु भगवान से बोला भगवान विष्णु ने बोला राम जी ने खुद जाकर बोला कि माता मुझे तुम आपसे बनवास चाहिए तो केकई ने बोला कि मुझे मुझे भी आपसे कुछ चाहिए तो भगवान राम बोले बोला माता क्या चाहिए आपको तो तब उन्होंने बोला कि अगले युग में आप मेरे गर्भ से उत्पन्न हो तब उन्होंने राम जी ने कहा कि हे माता यह तो मैं माता देवकी को ही वचन दे चुका हूं पर मैं आपको यह वचन देता हूं कि मेरा बचपन आपकी ही गोद में पूरा कटेगा तो कैकई जो थी वह यशोदा थी बट परंतु एक चीज याद रखिए आप केकई के नाम पर कभी भी इस दुनिया में आज तक किसी ने केकई और मंथरा के नाम पर कोई नाम नहीं रखा होगा अपने बच्चे का तो श्री कृष्ण जी वही बात बोल रहे हैं कि जो धर्म युक्त को डरपोक होता है अगर व चाहता है तो उसकी सदियों तक बुराई होती है उससे अच्छा तो मर जाना बेहतर है और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा
श्री कृष्ण जी कहते हैं कि हे अर्जुन अब जो लोग तुझे महार्थी समझ रहे हैं
वे महार्थी लोग तुझ भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे हां अब श्री कृष्ण जी कहते हैं कि हे अर्जुन अब जो लोग तुझे महार्थी समझ रहे हैं और समझते भी थे महार्थी समझ रहे हैं श्री अश्वथामा जी जो अभी भी अमर है | तो अगर तुम यह धर्म युक्त शोक विलाप करकर बैठ जाओगे और युद्ध नहीं करोगे तो वह जो लघु लघुता है ना वह महारथी लोग भी तुम्हें भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मांगे मतलब यह वो तुमको भगोड़ा मानेंगे कि हम इनको महार्थी मानते थे श्री कृष्ण जी यह बात बोलना चाह रहे हैं श्री कृष्ण जी बोले वे महार्थी लोग तुझे भय की कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे फिर कि तू डर गया तेरे समर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग वचन भी कहेंगे उससे अधिक दुख और क्या होगा तेरे वैरी समर्थ सामर्थ्य की निंदा करते हुए तेरे सामर्थ्य सामर्थ्य मतलब साहस साहस की निंदा करते हुए बुराई करते हुए तुझसे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे जो ना कहने वाली बातें हैं ना वह भी तुझे कहेंगे ठीक है उससे अधिक दुख और क्या होगा तेरे लिए अभी आपको सिंपल में तो समझ में आ रहा है ना मैं कथा में क्या बोलना जा रहा हूं कि जो दुश्मन है वह दुश्मन तुम्हारे बारे में तुम्हारा जो तुम्हारा साहस बना हुआ था सामर्थ्य बना हुआ था उसके बारे में कितनी बुराइयां करेंगे और बोलेंगे बाद में अयोग्य वजन जो वचन कहेंगे तोसे बहुत से ना कहने वाले ना कहने वाले योग्य जो ना कहने वाली भी बातें हैं ना इंसान को वह भी तेरे खिलाफ कहेंगे मतलब ऐसी ऐसी बुराइयां करेंगे वो बोला ये इसी लायक था यह था हमारी भाषा में मतलब बोलते हैं ना उससे अधिक दुख और क्या होगा और सही बात है यह तो हम पर बीत भी है कि अगर कोई हमारी बुराई करता है और बहुत ज्यादा बुराई करता है जैसे मैं अपने आपको बोलता हूं कि मैं धर्म के यह योग्य हूं और फिर मैं वो काम नहीं कार्य मेरे ही उसमें हो जाता है और मैं धर्म के खिलाफ हो जाता हूं तो आपने भी गांव में देखा है ना कि फौजदारी अगर हो जाती है तो उसम बोलते हैं बोला वैसे तो बड़ा धर्म धर्मवीर बना फिरता था घूम के कि मैं यह कर दूंगा वो कर दूंगा और अभी देखो कैसे इसको दो मिनट में पटक के मार दिया और ऐसे ऐसे वचन मतलब आप समझ भी नहीं पाओगे कैसी कैसी बातें तो यह बात .|
श्री कृष्ण जी ने उस समय में अर्जुन जी को समझाई
श्री कृष्ण जी ने उस समय में अर्जुन जी को समझाई थी या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा या तो तू युद्ध में शहीद होकर मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी राज्य को भोगे मतलब पृथ्वी पर राज करेगा ठीक है मतलब या तो मरा धर्म युद्ध में मारा जाएगा तो स्वर्ग को प्राप्त होगा क्योंकि धर्म के लिए हुआ है और अगर संग्राम में जीतकर युद्ध में जीतक पृथ्वी का राज्य मतलब जो तेरा हस्तिनापुर का राज्य है उसको भोगे कि उस पर राज करेगा ठीक है इस कारण हे अर्जुन तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा तब उन्होंने बोला श्री कृष्ण जी ने कि हे अर्जुन तू बिल्कुल दृढ़ निश्चय अपना मन ठान ले बाकी सब साइड कर दे सिर्फ युद्ध कर धर्म का युद्ध कर ठीक है अध्याय 37 यही समाप्त होता है
सीताराम राधे कृष्ण

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