अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है
अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है
परमात्मा है उनको भी नहीं भूलना चाहिए
सीताराम राधे कृष्ण | कल हमने अध्याय तृतीय का श्लोक नंबर 13 तक समाप्त किया था | तो आज हम अध्याय तृतीय का श्लोक नंबर 14 से करेंगे | तो आशा करता हूं आपके घर में सब सुख शांति से होंगे और सब कुशल मंगल होंगे आप अपने मात पिता की सेवा अच्छे से कर रहे होंगे आप अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे रहे होंगे पढ़ाई पर उनके अच्छे ध्यान दे रहे होंगे परंतु यह है कि अपने जो परम पिता परमात्मा है उनको भी नहीं भूलना चाहिए कभी भी आप जो भी देखिए जाना मतलब यह है कि हम यहां पर हैं पृथ्वी पर अगर हम यहां पर जब तक हम यहां पर हैं तब तक तो हम हम नहीं जानते ना हमारे साथ में क्या होने वाला हमारा जो भी कुछ है पाप है पुण्य है
संपूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं
सब ऊपर जाकर पता चलना है तो आप बिना किसी स्वार्थ के क्यों ना जिस धर्म जिस पंथ जिस हिंदू सनातन से आप जुड़े हुए हैं तो आपको उसको जानना जानने का अधिकार है तो आपको जानना भी चाहिए उस चीज को तो मेरी आप सबसे यही प्रार्थना है कि थोड़ा सा आप भी अपने घर पर थोड़ा सा जागरूक होइए दिन में सिर्फ ज्यादा नहीं तो आधा घंटा ही कर लीजिए श्लोक नंबर 14 और संपूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैंअन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है कर्म समुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है देखिए कितनी अच्छी बात कही है हम लोग क्या करते हैं कि यज्ञ नहीं कराते हैं
यज्ञ के बहुत सारे कारण थे
अच्छे पंडितो से वैसे जितनी भी नेगेटिविटी है वह सारी जितनी आपकी वायु है पहले अच्छा पहले क्यों यज्ञ होते थे अधिकतर आपको यह जानने की जरूरत है मेरे हिसाब से मेरे जो मैं अपनी सोच के हिसाब से बता रहा हूं कि यज्ञ होता था एक तो परमा को खुश करने के लिए दूसरी चीज होती थी यज्ञ के बहुत सारे कारण थे कि यज्ञ जो प्रदूषण होता शुद्ध हवा वायु शुद्ध करना जिस जिस एरिया जिस जगह पर जहां जहां तक जहां जहां तक की जो धुआ समझ लीजिए या यज्ञ का जो भी खुशबू है जो भी वो जाती थी तो वहां से नेगेटिविटी सब जो नकारात्मक आत्मा चीजें है वो सब हट जाती थी तो इसमें यही बताया गया है कि संपूर्ण प्राणी से उत्पन्न होते हैं
वेदों से उत्पन्न होते हैं
अन्य की उत्पत्ति वृष्टि से होती है वृष्टि यज्ञ से होती है ठीक है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला जब तक आप कर्मों से यज्ञ तो कर्म से उत्पन्न होने वाला यज्ञ है कर्म समुदाय को त वेद से उत्पन्न जो वेदों से उत्पन्न होते हैं वेदों में ही देख देखि जानकारी दी गई है कि आपको कर्म क्या करना है कौन सा सही कर्म क्या है क्या सब हमारे अभी देखिए मैंने वेद पढ़ने स्टार्ट नहीं किए हैं वेद भी प्रारंभ करेंगे तो पहले गीता का अध्याय जितना है गीता को समझ लेते हैं उसके बाद में आपको धीरे-धीरे वेद चारों वेद और जितना मेरे से हो सकता है जब तक मैं कर सकता हूं तब तक मैं करूंगा वेदों को अविनाशी परमात्मा वेदों को अविनाशी जिसका विनाश ना हो परम पिता परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान समझकर तो जो परमपिता है परमपिता से ही देखिए वेद कब लिखे गए किसी को नहीं वेद हमारे कई हजारों साल पुराने हैं और कैसे लिखे गए क्या लिखे गए किसने लिखे जैसा जो बताते हैं
परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित
वैसा ही हम समझ लेते हैं पर देखिए व लिखे तो गए हैं पर उसमें जो बताया गया है उसमें यह बताया गया है कि इस पृथ्वी पर तुमको किस तरीके से इस मनुष्य शरीर में जीना चाहिए इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित इसीलिए मतलब यही सिद्ध होता है कि जिस घर में यज्ञ होता है उस घर में परम पिता पर परम पिता परमेश्वर का हमेशा विराजमान होते हैं हे पार्थ जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परंपरा से प्रचलित सृष्टि चक्र के अनुकूल नहीं तता है अर्थात अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता है वह इंद्रियों के द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायी देखिए इसमें बताया हे पथ अर्जुन जी से कहते श्री कृष्ण जी पर्थ जो पुरुष इस लोक में इस पृथ्वी लोक में इस प्रकार परंपरा से प्रचलित सृष्टि चक्र के अनुकूल नहीं बरता है
क्या धर्म है क्या अधर्म है
जो अपनी परंपरा के अनुकूल नहीं चलता है जो सृष्टि ने बनाया है जैसे बनाया उसके अनुकूल नहीं चलता है नहीं चलता है वह अपने कर्तव्यों का पालन भी नहीं करता है जो उसके कर्म है कर्तव्य है उसका क्या धर्म है क्या अधर्म है वो उसको कोई समझ नहीं होती व अपने कर्तव्य का कोई पालन नहीं करता है वह इंद्रियों के द्वारा भोगों में अपनी जो मन की अपने जो इंद्रिया है इंद्रियों के द्वारा अपने व इंद्रिया उनको वश में कर लेती है रमण करने वाला पाप आयु जो पाप आयु मतलब समझ लीजिए आप जो हो गए जो अधर्म करते हैं गलत करते हैं गलत सोचते हैं किसी का भी कुछ भी करते हैं हर चीज पाप ही होती है
पाप आयु जो पाप करता है
देखिए पाप तो हर इंसान से होता है क्षमा उसकी हमेशा मांग लेनी चाहिए क्या पता जाने अनजाने में हमसे कितने पाप हो जाते हैं पर इसका मतलब य तो नहीं होता कि आप उस चीज को करते जाइए देखिए परमात्मा वो है जो आप जिस समय जिस समय आप उनको याद करेंगे सच्चे दिल से और क्षमा मांग लेंगे तब से ही वह आपके सारे पाप और सब जितने भी आपका कर्म है सब वो एक जगह हो जाएगा और पाप एक साइड हो जाता है यज्ञ में प्रतिष्ठित होता है तो रमण करने वाला पाप आयु जो पाप करता है वह व्यर्थ ही इस जीवन में जीता व पुरुष व्यर्थ ही जीता है उसका कोई मतलब अर्थ कोई उसका टारगेट नहीं कुछ नहीं वह व्यर्थ ही जीवन में जी रहा है
आत्मा को शुद्ध करने के लिए
क्योंकि मनुष्य योनि में जो आदमी आता है वह अपनी आत्मा को शुद्ध करने के लिए आता है देखिए आपको मैं सबसे अच्छी बात बताऊ जो अपने सनातन धर्म में है व है संस्कार जो अभी मरे नहीं बस उनको जागरूकता की क्या जरूरत है इसमें देखिए एक तो होता है किसी चीज में लालच कि मैं इस लालच में कर रहा हूं एक होता है बिना लालच के एक यह होता है कि यार अगर मैं कर रहा हूं तो मेरे जरिए अगर एक भी आदमी अगर उस चीज को सुन लेता है तो मैं कम से कम उस चीज का उस मेरा वह जो कर्म है वह थोड़ा सा सफल हो जाता है
जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने
मैं अगर समझ रहा हूं थोड़ा सा समझ रहा हूं तो आपको भी इस चीज को अगर मेरे जरिए आप उसको समझ जाते हैं तो बहुतअच्छी बात है श्लोक नंबर 17 में बोलते हैं हम परंतु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने का करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही संतुष्ट हो उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है देखिए परंतु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला हो और आत्मा में ही तृप्त हो जाए मतलब आत्मा में ही तृप्त रहे वो औरआत्मा में ही संतुष्ट रहे इसके अनुकूल और कुछ ना मांगे उसके लिए ही के लिए कोई कर्तव्य नहीं है उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और नए कर्म के के ना करने से कोई प्रायोजन रहता है तथा संपूर्ण प्राणियों में इसका किस मात्र भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता है
महापुरुष किसी भी लालच से परे
कदाचित आपको एक चीज मैं आपको बताऊं जो महापुरुष किसी भी लालच से परे होता है लालच लोभ या किसी भी चीज को मतलब उसको सिर्फ अपने ही जो हमको परमात्मा ने दिया है उसी में संतुष्ट रहता है उसका किसी से कोई स्वार्थ नहीं होता तो संपूर्ण प्राणियों में भी इसका स्वार्थ मतलब जो भी प्राणी कौन क्या कर रहा है मुझे तो परमात्मा को परमात्मा में लेन होना है तो वह वह प्राणी उसका कोई स्वार संबंध नहीं होता इसलिए तू निरंतर आसक्ति से रहित होकर इसलिए तू निरंतर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म को भली भाति करता रहे
मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है
देखिए आसक्ति से रहित होकर मतलब आप क्या मान सकते हैं जैसे प्रेम भाव हो गया और डर डर हो गया इसमें कई सारे वर्ड आ जाते हैं कि परिवार में मेरा परिवार है और मैं कैसे मार सकता हूं मन विचलित होने लगता है तो उसमें बोल रहे हैं कि सब चीज को त त्याग कर अपने कर्तव्य और कर्म को भली भाति करता रहे क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है जो शक्ति आसक्ति जो आसक्ति से रहित होता है जिसमें आसक्ति का विकास नहीं आसक्ति नहीं होती है आसक्ति रहित रहता है हुआ जो किसी बिना लालच के बिना लोभ के अपने कर्म को करता है मनुष्य परमात्मा वह मनुष्य परमात्मा को अवश्य प्राप्त होता है जनका दी ज्ञानी जन भी आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं
ज्ञानी जन जो ज्ञानी पुरुष
देखिए ज्ञानी जन जो ज्ञानी पुरुष जैसे जनक मतलब इसमें एक उदाहरण दिया गया है जनक आदि ज्ञानी जन भी आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए ना कोई लालच ना लोभ मत रखिए किसी चीज से हर चीज से परे हो जाए इसलिए तथा लोक संग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने को ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है इसलिए अपना जो लोक संग्रह है लोक संग्रह मतलब समझिए कि अब आपको मैं लोक संग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने को ही योग्य है लोक संग्रह मतलब अपने आगे पीछे का को देखना और मेरा हो गया हो गया मेरा परिवार कहां चला जाएगा सब कुछ वो देखते हुए भी तो कर्म करने को योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित होगा ठीक है मेरे हिसाब से मैं आपको एक ही बात बताऊंगा कि हमेशा कभी भी दिल में कोई छल कपट ना रखे किसी भी उस में भेद भाव ना कीजिए किसी भी विषय में लड़का लड़की क्या है उसमें कभी भेद भाव मत कीजिए प्लीज और माता पिता अपने परिवार जनों में कभी भेदभाव मत कीजिए
आप एक योग्य पुत्र और पुत्री है
देखिए माता-पिता तो बहुत अलग आ जाते माता-पिता तो वो तो उनके तो आपको सर पर बिठा के रखना चाहिए मैं बताता हूं ठीक है क्योंकि वह अपनी आपकी जिंदगी बढ़ाने के चक्कर में व अपनी जिंदगी भी कम करते चले जाते हैं और अपने बारे में कभी जिंदगी में उन्होंने सोच सोचता नहीं तो आपका फर्ज क्या बनता है कि आपका फर्ज बनता है जो हमारे मात पिता को नहीं मिल पाया उस समय के उस समय काल में उन इच्छाओं को उनको उन्होंने अपने अंदर समेट के दबा के रखा तो उन इच्छाओं को बाहर निकलवाना और उन इच्छा को उनके बिना कहीं पूरा पूर्ण कर देना अगर आप उस चीज को पूरा कर देते हो तो समझ लीजिए कि आपसे उनकी इच्छा जाने बिना उस चीज को पूरा करना तो समझ लीजिए आप एक योग्य पुत्र और पुत्री है तो बस आपसे मेरी यही प्रार्थना है आज मैंने शुरू में यही बताया था कि थोड़ा सा मेरा आज क्या है कि अंदर थोड़ा सा गला सा भी खराब हो रहा है
सनातन धर्म से जुड़े रहिए
तो मैं आज थोड़ा थोड़ा सा ही समझा पाऊंगा तो इतना ही आज के लिए इतना ही रहेगा पर बस मैं आपसे यही प्रार्थना करता हूं कि सदा अपने माता पिता की सेवा करते रहिए और सनातन धर्म से जुड़े रहिए और अपने शास्त्र और जितने मैं यह नहीं बोलता कि आप आगे मत बढ़ी आगे बढ़ आगे बढ़ी जितने भी हम जो भी आज की डेट में आगे बढ़े हुए व हमारे शास्त्रों के ज्ञान से आगे बढ़े हुए उन्होंने हमारे कितने भी सब है
शास्त्रों का अध्ययन जरूर
सब कितने बड़े साइंटिस्ट आप देख लीजिए कोई भी है उन्होंने हमारे शास्त्रों का अध्ययन जरूर किया है आप कहीं भी सर्च कर लीजिएगा क्योंकि हमारे शास्त्रों में इतनी चीजें छुपी हुई है आप उनको अगर अंग्रेजी में पढ़ना चाहे अंग्रेजी में पढ़ लीजिए संस्कृत में समझ में नहीं आता है तो संस्कृत में मत पढ़िए हिंदी में पढ़ लीजिएअंग्रेजी में पढ़ जो लैंग्वेज में आपको समझ में आता है आप उसम पढ़िए पर थोड़ा थोड़ा समय जरूर दीजिए अपने जीवन को ऐसे ही व्यर्थ मत कीजिए अपने माता पिता की सेवा कीजिए अपने घर का न रखिए सुख में रहिए मंगलमय रहिए के घर में सुख शांति रहे सीताराम राधे कृष्णा |
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