पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को त्याग देता
पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को त्याग देता
श्री कृष्ण जी बोलते हैं अर्जुन से कि हे पर्थ जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को भली भाति त्याग देता है
सीताराम राधे कृष्ण मित्रों कल हमने अध्याय दो के श्लोक नंबर 54 तक का अनुवाद किया था तो प्रारंभ करते हैं श्लोक नंबर 55 श्री कृष्ण जी बोलते हैं अर्जुन से कि हे पर्थ जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को भली भाति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है उस काल में ही वह स्थित प्रज्ञ कहा जाता है देखिए आज के अभी जो कलयुग चल रहा है इसमें यह तो सब भली भाति जानते हैं कि सबको यह तो पता है कि मरना है जीना है बस कमाना है खाना है पालना है बस आत्मा तक संतुष्ट है
मजाक बना दिया जाता है
उसके ऊपर जाने की कभी किसी ने कोशिश नहीं की ठीक उसका ज्ञान लेने की हमारे जो ऋषि मुनियों ने ज्ञान दिया है उसको कभी पढ़ने की चेष्टा नहीं की कभी अभी दूसरी बात यह है कि देखो कोई कोशिश भी अगर करे तो उसका पता है क्या मजाक बना दिया जाता है तो मजाक के डर से इंसान उसको दबा लेता है ना आजकल इंसान को यह चीजें पसंद आ रही है जैसे के कहीं डांस चल रहा है तो डांस पसंद रहा है कोई अच्छा सा जोक मार दिया या कोई किसी की आपने कोई गिर रहा है गिर रहे की एक्सीडेंट हो गया उसकी वीडियो बना दी उस परे उसको तो आप बहुत अच्छे खुश रहेंगे ना |
श्री कृष्ण परम ब्रह्म है
सतयुग में राक्षस और देवता अलग-अलग लोक में रहते थे और उसके बाद त्रेता युग आया त्रेता युग में राक्षस और देवता एक ही लोक में रहते थे मृत्यु लोक जो पृथ्वी लोक होता है यह पृथ्वी लोक में और उसके बाद आया द्वापर युग तो द्वापर युग में भी द्वापर युग में और भी ज्यादा होता चला गया मैं आपको वैसे उसी तरीके से बता दूंगा कि द्वापर युग में यह द्वापर युग में यह हुआ कि एक ही परिवार में आ गए दुष्ट भी एक ही परिवार में है और भगवान भी एक ही परिवार में है भगवान की प्रवृत्ति रखने वाला इंसान भी एक ही परिवार में है और दुष्ट भी एक ही परिवार में है दुष्ट की प्रवृत्ति रखने वाला जैसे कि आप सोच लीजिए दुर्योधन और युधिष्ठिर हो गए अर्जुन .श्री कृष्ण तो भगवान है परमात्मा है वो तो परम ब्रह्म है
इंसानियत भी है देवता
फिर उसके बाद अभी कलयुग आया कलयुग में क्या है कलयुग में एक ही आदमी के अंदर है एक ही आदमी के अंदर दोनों प्रवृत्ति है क्या-क्या है इंसानियत भी है देवता इंसानियत इंसानी रूपी देवता भी है और राक्षस भी है पर अभी क्या है कि व राक्षस इंसानी रूपी 99 पर लोगों पर हावी है इस दुनिया में मात्र सिर्फ 1 पर लोग ऐसे होंगे जो अपने आप को संभाल पाते हैं और उस इच्छा को दबा देते हैं और भगवान में थोड़ा सा विश्वास करते हैं कि हां कि वाकई में भगवान है ये ठीक है और अभी श्लोक 56 पढ़ते हैं फिर उसके बाद और बात बताऊंगा आपको अगर अच्छी लगे थोड़ी अच्छी लगे समझा पाऊं जिस तरीके से मैं समझा पा रहा हूं अगर आपको वैसे कोशिश तो मैं पूरी करता हूं कि मैं सही से समझा पाऊं ठीक तो जितना हो सकता है मैं उतना समझा पाता हूं अभी देखिए मैं संत तो इतना बड़ा हूं नहीं मैं एक बिल्कुल साधारण सा मनुष्य आदमी हूं तो जैसा मैं खुद पढ़ता हूं वैसा ही मैं कोशिश करता हूं |
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा नि स्पेह है तथा जिसके राग भय और क्रोध नष्ट हो गए हो ऐसे मुनि स्थिर बुद्ध कहा जाते हैं देखो इसमें भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जिस व्यक्ति को दुख दुखों की प्राप्ति होती है जो व्यक्ति दुखों से नहीं टूटता है दुखों में भी भगवान को नहीं छोड़ता है
सुखों की प्राप्ति में जो सुख आने पर भी
और जिसके मन में उद्वेग मतलब उद्वेग यह हो गया कि जैसे दुख आ गया तो फिर वही दोष देना भगवान को कि बस हमको ही दुख देना था क्या है ना नहीं होता सुखों की प्राप्ति में जो सुख आने पर भी भूल जाना है दुख में तो देना ही देना है सुख में भी भूल जाना है ठीक है पर इसमें हां तथा जिसका तो दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता जो आदमी दुख पीड़ा मैंने जो पहले वह बताया वह मैं यह बताया कि जो दोष देते हैं जैसे हम हम मैं मैं ही क्यों ना हूं या आप क्यों ना हो अगर मेरे घर में कोई नुकसान हो जाता है तो हम सबसे पहले बोलते हैं
बुद्धि स्थिर होनी चाहिए
बोला हे भगवान मेरे ही घर में ये होना था है ना तो इसमें जो इसमें कहा गया है वो आज की डेट में उसका उल्टा है दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता दुखों की प्राप्ति मतलब दुख जो दुखों से भी लड़ता है फिर भी भगवान को नहीं भूलता है सुख की प्राप्ति होने पर भी निप्र होता है अगर सुख भी होता है तो भी भगवान को भी याद रखता है तथा जिसके राग राग गायन भय डर और क्रोध नष्ट हो जाते हैं क्रोध मतलब गुस्सा नष्ट हो गए हो ऐसे मुनि स्थिर बुद्धि कही जाते हैं ऐसे जो मुनि होते हैं मुनि होते हैं मुनि ऋषि मुनि कह लो इंसान कह लो इंसान मुनि होते हैं मुनि इंसान होते हैं बस उनकी बुद्धि स्थिर होनी चाहिए जो सोच है वह एक जगह टिकी होनी चाहिए
भगवान श्री कृष्ण परमात्मा तो उनको स्थिर कहा जाता है
श्री कृष्ण परमात्मा तो उनको स्थिर कहा जाता है जो पुरुष सर्वत्र स्नेह रहित हुआ हो उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर ना प्रसन्न होता है और ना द्वेष करता है उसकी बुद्धि स्थिर है जो पुरुष सर्वत्र स्नेह रहित हुआ स्नेह जो सबसे प्यार करने वाला होता है उस उस शुभ अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता हो जिसे कोई फर्क ना पड़ता हो शुभ हो अशुभ हो कोई भी वस्तु हो है ना उससे कोई प्र संता ना होती हो
श्री राम जी का जब तिलक हुआ
जैसे आप एग्जांपल ले लीजिए भगवान श्री राम जी का जब तिलक हुआ तो सबको उपहार में भेंट दी जा रही थी तो हनुमान जी को बुलाया गया हनुमान जी को भगवान श्री राम ने अपने गले से माला एक मोतियों की महंगी माला उतार कर दी तो भगवान जी उसको भगवान हनुमान जी उसको दांतों से तोड़ने लगे मतलब जितना मैंने सीखा है मैं उतना ही आपको बता रहा हूं तोड़ने लगे तो सब लोग बहुत मतलब म अचंभे से आश्चर्य चकित होकर देखने लगे और बोलने लगे बोला आपको मतलब भगवान राम ने इतनी अच्छी इतनी अच्छी स्वर्ण मुद्रा माला दी है आप उसको तोड़ रहे हो तो भगवान हनुमान जी का क्या जवाब होता है कि मैं इसको तोड़ नहीं रहा हूं मैं इसमें भगवान राम को ढूंढ रहा हूं अब इसमें तो मुझे कहीं भगवान राम दिख नहीं रहे और जिस चीज में भगवान राम नहीं वो मेरे किस काम की है चाहे वह सोने की हो या कुछ भी हो तो वही भक्ति है
पूजे तो पत्थर भगवान हो जाए
कि परमात्मा जिस चीज में परमात्मा नहीं तो वह काम किस काम की चीज है ना व शरीर कोई काम का है ना ही आप किसी भी वस्तु को किसी सोना चांदी कुछ भी अगर आप लेकर रख लो देखो पूजे तो पत्थर भगवान हो जाए और ना पूजे तो सोना भी पत्थर रह जाता है हम यह भी आपको पता है है ना के मन में अगर सच्ची भावना ना हो और सोने की मूर्ति सामने रख दी जाए तो आप उसमें भगवान नहीं होते और अगर आप पूजने पर भी पत्थर पत्थर जो होते हैं अगर उसमें आप अपनी मन जो स्थिर मन है उसमें परमात्मा को खोजे अंतरात्मा से तो वह भी आपके लिए भगवान है और उसी का एक उदाहरण मैं आपको बताता हूं यह है एक नीलकंठ वर्णी जी है |
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो सभी से प्यार करता है
नीलकंठ वर्णी जी अक्षर धाम तो आपने सुना होगा ना नीलकंठ वर्णी जी कभी आप उनकी कहानी सुनिए जब वह मतलब ज्ञान के लिए और पूरा भ्रमण करने के लिए निकले थे तो सिर्फ एक वस्त्र एक जप माला और एक गले में पत्थर रूपी भगवान को परमात्मा मानकर उन्होंने गले में बांध लिया था तो बस उनको लेकर निकले थे जब भी वह अपना सब कुछ करते थे सबसे पहले अपना पूजा करते थे तो वो उसी कपड़े को गले से उतार कर उसी कपड़े को रखते थे उसमें पत्थर रखते थे फिर उन्हीं पर जल देते थे फूल चढ़ाते थे सब कुछ करते थे तो पूजे तो पत्थर भी भगवान हो जाते हैं
शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त
पर अपने मन में इच्छा तो होनी चाहिए ना हम अगर पढ़ना ही नहीं चाहेंगे समझना ही नहीं चाहेंगे कि भगवान क्या है तो फिर हमें पता कैसे चलेगा तो भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो सभी से प्यार करता है जो पुरुष सर्वत्र स्नेह रहित हुआ उसे उस उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर प्रसन्न ना होता हो ना प्रसन्न होता हो और ना द्वेष करता हो ना किसी से चिड़ता रहता है और होना भी ऐसे ही चाहिए आप कभी किसी का बुरा मत सोचो बुरा मत करो कभी आपके साथ बुरा नहीं होगा यह बात सही है आप कभी आजमा के आप यह चीज देख लीजिए कि आप अगर अपनी सोच में कभी किसी का बुरा नहीं करते हो और जलन नहीं मतलब जलते नहीं हो किसी से तो आपके साथ कभी बुरा नहीं होता है उसकी बुद्धि स्थिर है ऐसा समझना चाहिए |
श्लोक नंबर 49 इंद्रियों के द्वारा
श्लोक नंबर 49 इंद्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण ना करने वाले पुरुष के भी केवल विषय में निर्वत हो जाते हैं हो जाते हैं परंतु उनमें रहने वाली अशक्त आसक्ति निर्वत नहीं होती इस स्थि स्थित प्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निर्वत हो जाती है इंद्रियों के द्वारा विषयों में इंद्रिया मतलब जो हमारा मन है मन को ही आप इंद्रिय बोल सकते हैं मन को ही आप इंद्री बोल सकते हैं मन को ही आप इंद्रिय बोल सकते हैं और सब कुछ हमारे मन पर ही निर्भर करता है कि आपने पहले संस्कृत में बोलते जिसने अपनी इंद्रियों पर मतलब काबू पा लिया तो वही प्राणी संत हो जाता है सब कुछ हो जाता है और आज के जमाने में यह बोला जाता है कि जो अपनी मन की इच्छा को वहीं पर दबा लेता है अपनी इच्छा अनुसार कर लेता है तो वही है वो हो जाता है |
श्री कृष्ण कहते हैं हे अर्जुन आसक्ति का नाश न होने के कारण यह परमर्थम स्वभाव वाली इंद्रिया यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात हर लेती है
श्री कृष्ण कहते हैं हे अर्जुन आसक्ति का नाश न होने के कारण यह परमर्थम स्वभाव वाली इंद्रिया यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात हर लेती है अच्छा य यहां देखो इसमें बताया गया है कि हे अर्जुन आसक्ति का नाश न होने के कारण यह प्रथम स्वभाव स्वभाव वाली इंद्रिया यत्न करते हुए यत्न प्रयत्न करते हुए जो इंद्रिया है जो मन है आपने देखा होगा ना कभी मन इधर डोलता है कभी मन इधर डोलता है
इस दुनिया में बस यह है
श्लोक नंबर 60 अभी श्लोक नंबर 61 लास्ट हम पढ़ेंगे अभी बाकी का धीरे-धीरे अध्याय आपको मैं बताता रहूंगा जैसा मैं आपको समझा पा रहा हूं वैसा ही मुझे जैसा मुझे ज्ञान है कि जैसी मतलब मैं जैसा पढ़ पा रहा हूं हिंदी में वैसा ही मैं आपको समझा पा रहा हूं मेरे ने बोला कि चलो मैं पढ़ रहा हूं चुपचाप क्यों पढ़ूं क्या पता मेरे जरिए एक या दो कोई सुन ले और जो ना नहीं भी सुनेंगे तो क्या हो हो गया रहेंगे तो वह भी इस दुनिया में बस यह है कि जो एक बार आप इसको पढ़ोगे तो आपको पता चलेगा कि हां जीने का मकसद सही में होता क्या है
संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके
इसलिए साधकों चाहिए कि वह उन संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके सह समाहित चित्त हुआ मेरा प्रणय होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इंद्रिया बस में होती हैं उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है इसलिए साधक को चाहिए कि जो साधना करने वाला है उसको चाहिए कि वह उन संपूर्ण इंद्रियों को वश में कर ले अपने वश में करके समाहित चित्त बिल्कुल चित्त समाहित चित ये यहां पर अगर आप दोनों ध्यान यहां पर यहां और यह नाक के इस जगह पर रखेंगे और हर चीज आप थोड़ी देर आप मेडिटेशन और वैसे करके देखिए सिर्फ यहां पर देखि तो आपको एक ध्यान से बिल्कुल छोटा सा एक रोशनी टाइप की आपको दिखाई देगी कुछ देर तक आप देखि आपको जितना अच्छा लगेगा तो उसको बोलते हैं
पुरुष अपने मन को वश में कर लेता
कि मन की इंद्रियों को कुछ नहीं सुनाई देना भगवान परमात्मा सुनाई देना मेरे परायण में होकर ध्यान में बैठे हो मतलब मेरे अधीन होकर बैठ जाए मेरे परायण में मेरे परमात्मा के मतलब परमात्मा के परमात्मा में बैठ जाए क्योंकि जिसके पुरुष की इंद्रिया वस में होती है उसकी बुद्धि स्थिर होती है जो पुरुष अपने मन को वश में कर लेता है उसी की सोच सबसे अच्छी होती है उसी की बुद्धि स्थिर होती है और आप अध्याय अध्याय दो का श्लोक नंबर 61 आज के लिए यहीं पर समाप्त करते हैं |
आदमी खुलता चला जाता है
अगर आपको थोड़ा बहुत भी मैं अच्छे से समझा पाया हूं कोशिश करता हूं कि थोड़ा और थोड़ा सही से समझा पाऊंगा एक दो बार में थोड़ा सही से समझा पाऊंगा क्योंकि देखिए कोई भी चीज आरंभ में आप स्टार्ट करते हो इंग्लिश में स्टार्ट करते हो प्रारंभ करते हो या आरंभ करते हो या शुरू करते हो तो थोड़ा सा झक सी होती है पर धीरे धीरे आदमी खुलता चला जाता है
बुरा मत सोचिए बुरा मत करिए
अभी आपको एक चीज मैं आपको एक सबसे अच्छी चीज बताऊंगा सबसे अच्छी चीज लास्ट में श्लोक बताता हूं के आप हमेशा खुश रहा कीजिए और कभी किसी का बुरा मत सोचिए बुरा मत करिए सोचने से आप अगर सोचते हैं कि मैंने कभी किसी का बुरा नहीं किया अगर आपने उसका बुरा सोचा भी है तो वह भी समझ लीजिए पाप ही है चाहे आपने किया क्यों ना हो हुए हमसे भी है ऐसी बात नहीं पर हम उस चीज का प्रश्चित कर रहे हैं क्योंकि मन की सोच को भी पापी माना जाता है जो गलत आदमी सोचता है जो सही है सही अपने मातृत्व को या अपने माता-पिता के थोड़ा सा जीवन देखता है इसके बारे में वैसे मैं आपको थोड़ा सा कल बताऊंगा क्योंकि समय थोड़ा सा मैं भी थोड़ा कलयुग में पैदा हुआ हूं तो थोड़ा सा धीरे-धीरे सुनाऊंगा और थोड़ा अच्छे से समझने की कोशिश करूंगा ठीक है
अपने माता-पिता का ध्यान रखें
तो अगर मेरी आपको थोड़ी बहुत भी अच्छी लगी हो जरा सा भी समझ में आया हो तो कोशिश कीजिए जीगा कि इसको पूरा देखा करें समझा करें थोड़ा ठीक है और थोड़ा सा और एक दो को आप सुनवाइए थोड़ा सा देखिए आवाज तो मेरी इतनी अच्छी है नहीं समझा तो मैं पाता नहीं हूं अब जैसी भी है मैं ऐसा ही हूं ठीक है पर मैं समझा थोड़ा अपनी तरफ से मैं थोड़ा सा सही से समझा पा रहा हूं बाकी आपके ऊपर ज्ञान है अपने माता-पिता का ध्यान रखें अपने घर में सुख शांति रखें सबसे प्रार्थना है कि बस अपने माता-पिता का ध्यान रखें ठीक है उसी में सब कुछ है जो अपने मां-बाप का ध्यान नहीं रखता वो किसी का ध्यान नहीं रख सकता परमात्मा में भी लीन नहीं हो सकता आप इस चीज का भी ध्यान रख सकते हैं
सीताराम राधे कृष्णा
क्योंकि माता-पिता आपको ये सोच र है कि उन्हीं माता-पिता के जरिए आप आज इस पोजीशन पर हैं और इस जगह पर है पर आज की जनरेशन में यह सब चीज करने वाले बहुत कम हैं जो अपने मां-बाप को यह सोचते हैं कि यार मैं अपने मां-बाप का ध्यान रखूं बाकी 99 पर 99 पर तो आपको पता ही है कि जो आदमी 21 साल की उम्र तक अपनी मां को ही रोटी मांगता है सब कुछ करता है उसके बाद ग्रहणी आने के बाद में पत्नी आने के बाद में तो फिर थोड़ा सा स्वभाव चेंज हो थोड़ा क्या पूरा धीरे स्वभाव चेंज हो जाता है अपने माता-पिता को माता-पिता की जगह पत्नी को पत्नी की जगह लेकर रख के चलते हैं मैं यह नहीं बोलता कि आप पत्नी को पत्नी की जगह मत रखिए या मां बाप को मां-बाप की जगह मत रखिए जो चीज गलत है उसको गलत को गलत बोलिए जो सही है सही को बोलिए तो अपना ध्यान रखिए खुश रहिए | सीताराम राधे कृष्णा |
श्री कृष्ण ने अर्जुन को क्या संदेश दिया था?
कोई टिप्पणी नहीं