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जिसको जानकर तू दुख रूप संसार से मुक्त हो जाएगा (sansar mukt ho jayega)

 



जिसको जानकर तू दुख रूप संसार से मुक्त हो जाएगा (sansar mukt ho jayega)


जिसको जानकर तू दुख रूप संसार से मुक्त हो जाएगा (sansar mukt ho jayega)

सीताराम राधे कृष्ण आशा करता हूं, आपके घर में सब सुख शांति से होंगे, आप अपने माता पिता की सेवा कर रहे होंगे अपने जीवन में व्यस्त होंगे तो कल हमने अष्टम अध्याय समाप्त किया था |आज हम नवम अध्याय प्रारंभ करेंगे |  श्री कृष्ण भगवान बोले तुझ दोष दृष्टि रहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली भाति कहूंगा | जिसको जानकर तू दुख रूप संसार से मुक्त हो जाएगा यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा सब गोपने हों का राजा है अति पवित्र अति उत्तम प्रत्यक्ष फल वाला धर्म युक्त साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है | 


हे परम ताप इस इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धा ?

हे परम ताप इस इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धा रहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्यु रूप संसार चक्र में भ्रमण करते रहते हैं | मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण हुए है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित है किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूं |

किंतु मेरी ईश्वर योग शक्ति को देख के भूत ?

वे सब भूत मुझ में स्थित नहीं है |किंतु मेरी ईश्वर योग शक्ति को देख के भूत की धारण पोषण करने वालों और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है |जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरण वाला महान वायु सदा आकाश में ही स्थित है वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से संपूर्ण भूत में मुझ में स्थित है ऐसा जान | 

अंत में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं !

हे अर्जुन कल्पों के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं |अर्थात प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों में आदि में उनको फिर फिर रचता हूं अपनी प्राकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूत समुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रसता हूं |

उन कर्मों में आसक्ति रही तो ?

 हे अर्जुन उन कर्मों में आसक्ति रही तो और उदासीन के सदृश्य स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बानते हैं,हे अर्जुन मुझ अधिष्ठाता के शकास से प्रकृति चराचर सहित सर्व जगत को रचती है |और इस हेतु से ही यह संसार चक्र घूम रहा है| 


अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिए ?

मेरे परम भाव को न जानने वाले मूड लोग मनुष्य को शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान ईश्वर को तुच्छ समझते हैं, अर्थात अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिए मनुष्य रूप में विचर हुए मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य मानते हैं,वे व्यर्थ आशा व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्त चित अज्ञानी जन राक्षसी असुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किए रहते हैं | 

अनन्य मन से युक्त होकर निरंतर भजते हैं!


परंतु हे कुंती पुत्र देवी प्रकृति के आश्रित महात्मा जन मुझको सब भूतों का सनातन कारण और नाशर रहित नाश रहित अक्षर स्वरूप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरंतर भजते हैं | वे दृढ़ निश्चय वाले भक्ति जन निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रमा प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान को युक्त होकर प्रेम से मेरी उपासना करते हैं दूसरे योग ज्ञान योगी मुझे निर्गुण निराकार ब्रह्म का  ज्ञान यज्ञ के द्वारा अभिन्न भाव से पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते हैं |

मुझ विराट स्वरूप परमेश्वर की पथक भाव से उपासना ?

 दूसरे मनुष्य बहुत प्रकार से स्थित मुझ विराट स्वरूप परमेश्वर की पथक भाव से उपासना करते हैं |कृतु मैं हूं यज्ञ मैं हूं स्वधा मैं हूं औषधि मैं हूं मंत्र मैं हूं ग्रत मैं हूं अग्नि मैं हूं और हवन मैं हूं |क्रिया भी मैं ही हूं इस संपूर्ण जगत का दाता अर्थात धारण करने वाला एवं कर्मों के फल देने वाला पिता माता पितामह जानने योग्य पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूं |तो आज हम अध्याय नौ के श्लोक नंबर 17 का तक यहीं पर समापन करते हैं कल आपसे यहीं पर मुलाकात होगी तो आप अपने घर में शांति से रहिए और परमात्मा को याद करते रहिए |अपने माता-पिता की सेवा करते रहिए अपने गृह जीवन में व्यस्त रहिए अपने बच्चों कोअच्छी शिक्षा दीजिए| 



                                        "सीताराम राधे कृष्ण"




























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